Thursday, December 29, 2016

प्रोपर्टी खरीदने से पहले रखें इन 10 बातों का ध्यान

अगर आप प्रॉपर्टी खरीदने का मन बना रहे हैं तो जाने ऐसी 10 बातें जिसके बाद आप कभी प्रॉपर्टी खरीदते वक्त धोखा नहीं खाएंगे


घर खरीदना हर किसी का सपना होता है। इस सपने को पूरा करने के लिए लोग अपने जीवनभर की कमाई लगा देते हैं। ऐसे में अगर आप कोई प्रॉपर्टी खरीदने का मन बना रहे हैं तो इससे पहले जागरण डॉट कॉम अपने पाठकों को ऐसी 10 बातें बता रहा है जिसे जानने के बाद कभी भी प्रॉपर्टी खरीदते वक्त धोखा नहीं खाएंगे।
जानिए 10 ऐसी जरूरी बातें-
जमीन की रजिस्ट्री जरूर मांगे
अगर आप घर खरीद रहे हैं तो बिल्डर और डेवलपर से सबसे पहले रजिस्ट्री मांगनी चाहिए। ऐसा कर आप यह जान पाएंगे कि जिस जमीन पर आपका मकान या फ्लैट बना है उसपर कोई कानूनी विवाद तो नहीं चल रहा है। बैंक सिर्फ उन्हीं जमीनों पर लोन देता है जिसपर किसी भी तरह का कोई विवाद नहीं है।
प्रोजेक्ट के अप्रूव्ड लेआउट मैप को देखें
किसी बिल्डर को किसी भी प्रोजेक्ट में कितने टावर, फ्लैट और मंजिल बनाने की मंजूरी मिली है यह बात अथॉरिटी की ओर से अप्रूव्ड लेआउट मैप को देखकर साफ पता चल जाती है। इसमें किसी फ्लैट या प्रोजेक्ट में इस्तेमाल होने वाली कुल जगह का स्पष्ट ब्यौरा होता है। ये सारी बातें कंपनी के ब्रॉशर में साफ नहीं हो पाती हैं।
लोकेशन और वास्तविक फ्लैट विजिट करें
ब्रॉशर में दिए गए फ्लैट के एरिया पर भरोसा नहीं करना चाहिए। जिस जगह प्रोजेक्ट बन रहा है वहां खुद जाकर विजिट करना जरूरी होता है। ऐसा करने से आप अपने फ्लैट में इस्तेमाल होने वाले रॉ मैटेरियल (कच्चे माल) को देख पाएंगे। साथ ही आपको आसपास की लोकेशन के बारे में भी जानकारी मिलेगी। जैसे घर से अस्पताल, स्कूल, बाजार, रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड जैसी जगहों की दूरी कितनी है इत्यादि। केवल ब्रॉशर के भरोसे रहने से आप गलतफहमी के शिकार हो सकते हैं।
बिल्ट-अप एरिया, सुपर एरिया और कार्पेट एरिया को समझें
खरीदार कई बार फ्लैट में लिखे सुपर एरिया को अपने फ्लैट का साइज मानकर फ्लैट की बुकिंग कर देते हैं। जबकि असल फ्लैट इससे काफी कम होता है। ऐसे में ग्राहकों को बिल्ट-अप, सुपर और कार्पेट एरिया के सही मायने समझ लेने चाहिए। कार्पेट एरिया उस एरिया को कहते है जहां आप कार्पेट बिछा सकें। इस एरिया में फ्लैट की दीवारें शामिल नहीं होती हैं। यह फ्लैट के अंदर का खाली स्थान होता है। बिल्ट-अप एरिया में फ्लैट की दीवारों को लेकर मापा जाता है, यानि इसमें कार्पेट एरिया के साथ-साथ पिलर, दीवारें और बालकनी जैसी जगह शामिल होती हैं। वहीं सुपर एरिया उस एरिया को कहते हैं, जिसमें उस प्रोजेक्ट के अंदर कॉमन यूज की चीजें को शामिल किया जाता है जैसे जेनरेटर रूम, पार्क, जिम, स्वीमिंग पूल, लॉबी, टेनिस कोर्ट आदि। आमतौर पर सभी बिल्डर्स फ्लैट को सुपर एरिया के आधार पर बेचते हैं।
अपने पजेशन टाइम का रखें विशेष ध्यान
अधिकांश बिल्डर्स और डेवलपर प्रोजेक्ट के पजेशन टाइम में 6 महीने का ग्रेस पीरियड भी जोड़ देते हैं। ऐसे में किसी भी ग्राहक का पजेशन टाइम दो साल की जगह 30 महीने हो जाता है। पजेशन डेट से 6 महीने देरी से पजेशन देने के बाद डेवलपर्स इसको लेट प्रोजेक्ट की श्रेणी में नहीं डालते हैं। ऐसे में ग्राहक बिल्डर या डेवलपर्स से लेट पजेशन की पेनल्टी भी चार्ज नहीं कर पाते हैं।
पेनल्टी क्लॉज को जरूर पढ़ें
तय समय तक प्रोजेक्ट पर पजेशन न दे पाने पर डेवलपर्स ग्राहकों को पेनल्टी देने का प्रावधान रखते हैं। अधिकांश डेवलपर्स पजेशन तक ग्राहकों की ओर से भुगतान की जाने वाली किसी एक भी किश्त में देरी होने पर पनेल्टी न देने की शर्त रखते हैं। पूरे 2 साल के दौरान ग्राहकों के पास कई बार डिमांड ऑर्डर आते हैं। अगर ग्राहक किसी एक भी पेमेंट डेट से चूक जाता है तो डेवलपर्स पेनल्टी देने में तरह-तरह के बहाने बनाते हैं।
पेमेंट स्कीम को समझें
डेवलपर्स बड़े-बड़े ब्रैंड एंबेसडर और ईजी पेमेंट प्लान की मदद से ग्राहकों को आकर्षित करने कोशिश करते हैं। इनमें 10 फीसदी बुकिंग अमाउंट बाकी पजेशन पर, 12/24/42 महीनों के लिए ब्याज छूट, 20:80 स्कीम (बिना बैंक फंडिंग के), 20:80’ / ‘10:90’ / ‘8:92’ / ‘5:95’ जैसी स्कींम्स काफी लोकप्रिय हैं। इन सभी स्कीमों की अपनी-अपनी महत्ता होती है। इससे फ्लैट के बुकिंग रेट और प्रोजेक्ट की कीमत पर भी काफी असर पड़ता है। इसलिए ग्राहकों को प्रॉपर्टी खरीदने से पहले इन सभी बारीकियों को सही से समझकर अपने लिए उचित पेमेंट स्कीम का चयन करना चाहिए।
हिडन चार्जेज पर दे विशेष ध्यान
बुकिंग करते समय कई तरह के चार्जेज का जिक्र बुकिंग एजेंट नहीं करता है। हिडन चार्जेज में पार्किंग चार्ज, सोसाइटी चार्ज, पावर बैक-अप जैसे चार्जेज को शामिल किया जाता है। इन सभी चार्जेज के बारे में बुकिंग के समय पर ही डेवलपर से सवाल कर समझ लें।
डेवलपर की पिछली हिस्ट्री के बारे में करें पता
जिस डेवलपर या बिल्डर के साथ आप अपना फ्लैट बुक करने जा रहे हैं उसकी ओर से पहले दिए जा चुके प्रोजेक्ट्स को जरुर देखें। इससे आपको कंस्ट्रक्शन क्वॉलिटी, समय से पजेशन देना, बिल्डर का प्रदर्शन जैसी चीजों को समझने में मदद मिल जाती है।
सुनिश्चित करें कि एक्सक्लेशन फ्री हों फ्लैट के रेट
कई बार डेवलपर प्रोजेक्ट पर एक्सक्लेशन चार्जेज लगा देते हैं। जैसे सीमेंट, सरिया आदि कच्चे माल के दाम बढ़ने पर डेवलपर ग्राहकों के लिए फ्लैट की कीमत को बढ़ा देते हैं। ऐसे में ग्राहकों को बुकिंग के समय इस बात को स्पष्ट कर लेना चाहिए कि फ्लैट पर किसी भी तरह के एक्सक्लेशन चार्जेज नहीं हैं।

गोल्ड बॉण्ड में निवेश करने के होते हैं 10 बड़े फायदे

इस फेस्टिव सीजन गोल्ड में निवेश करना चाहते है तो गोल्ड बॉण्ड एक बेहतर विकल्प है। जानिए गोल्ड बॉण्ड में निवेश करने के क्या हैं 10 बड़े फायदें 

इस फेस्टिव सीजन गोल्ड में निवेश करना चाहते है तो गोल्ड बॉण्ड एक बेहतर विकल्प है। निवेश के लिए सोने के सिक्के, गोल्ड फंड, गोल्ड ईटीएफ, गहने आदि तमाम लोकप्रिय विकल्प हैं, लेकिन इस सब के बीच गोल्ड बॉन्ड सोने में निवेश करने का एक अच्छा ऑप्शन है। जानिए गोल्ड बॉण्ड में निवेश करने के क्या हैं 10 बड़े फायदें।
गोल्ड बॉण्ड में निवेश के फायदे
बेहतर रिटर्न: गोल्ड बॉण्ड में निवेश करने पर अच्छा ब्याज मिलता है। इसमें ब्याज सहित सोने की कीमतों में आई तेजी के अनुसार रिटर्न भी मिलता है। साथ ही आपको बता दें इसमें निवेश करने से डीमैट और ईटीएफ जैसे कोई शुल्क नहीं लगाए जाते हैं। गोल्ड बॉण्ड की ब्याज दर 2.75 फीसदी है। इस पर मिलने वाला ब्याज सोने के मौजूदा भाव के हिसाब से तय होता है।
निवेश के साथ बचत भी: सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए आप गोल्ड बॉण्ड को डिजिटल फॉर्म में सुरक्षित रख सकते हैं। दूसरी ओर आप इसे अपने घर या डीमेट एकाउंट में भी रख सकते हैं। इससे आपका लॉकर पर होने वाला खर्च भी बच जाएगा।
धोखाधड़ी की कोई चिंता नहीं: गोल्ड बॉण्ड में किसी तरह की धोखाधड़ी और अशुद्धता की संभावना नहीं होती है। गोल्ड बॉण्ड में मिलने वाला सोना शत प्रतिशत शुद्ध सोने की ही वैल्यु देता है।
कैपिटल गेन टैक्स की हो सकती है बचत: गोल्ड बॉण्ड की कीमतें सोने की कीमतों में अस्थिरता पर निर्भर करती है। सोने की कीमतों में गिरावट गोल्ड बॉण्ड पर नकारात्मक रिटर्न देता है। इस अस्थिरता को कम करने के लिए सरकार लंबी अवधि वाले गोल्ड बॉण्ड जारी कर रही है। इसमें निवेश की अवधि 8 वर्ष होती है, लेकिन आप 5 वर्ष के बाद भी अपने पैसे निकाल सकते हैं। पांच वर्ष के बाद पैसे निकालने पर कैपिटल गेन टैक्स भी नहीं लगाया जाता है।
गोल्ड बॉण्ड यानी सरकारी गारंटी: गोल्ड बॉण्ड भारत सरकार की ओर से दी गई सॉवरन गारंटी होती है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि यह हमेशा सकारात्मक रिटर्न्स ही देगा।
बढ़वा सकते हैं गोल्ड बॉण्ड की मैच्योरिटी: गोल्ड बॉण्ड की अवधि मैच्योरिटी पीरियड के बाद तीन वर्ष के लिए और बढ़वाई जा सकती है। इसकी मदद से मैच्योरिटी के समय बाजार के नकारात्मक संकेतों से बचा जा सकता है।
गोल्ड बॉण्ड के गुणांक: गोल्ड बॉण्ड सोने के एक निश्चित वजन के आधार पर जारी किए जाते हैं। इसकी एक यूनिट एक ग्राम गोल्ड होती है। इसे एक ग्राम के गुणांक में ही लिया जा सकता है। आपको बता दें कि आप 500 ग्राम के अधिक गोल्ड बॉण्ड नहीं ले सकते हैं। यह कई गुणांक में उपलब्ध है, लेकिन इसको खरीदने के लिए एक तय सीमा है। आप न्यूनतम दो ग्राम और अधिकतम 500 ग्राम के गुणांक में खरीदारी कर सकते हैं। इसमें निवेश करने के लिए कम से कम 5000 से 6000 रुपए इंवेस्ट करना अनिवार्य है। इसकी न्यूनतम और अधिकतम सीमा एक साल हैं।
गोल्ड बॉण्ड को खरीदना है बेहद आसान: गोल्ड बॉण्ड को किसी भी एसबीआई ब्रांच, पोस्ट ऑफिस, स्टॉकहोल्डिंग कॉरपोरेशन और एनएसई व बीएसई आदि के माध्यम से खरीदा जा सकता है।
सेकेण्डरी मार्केट में गोल्ड बॉण्ड की ट्रेडिंग: गोल्ड बॉण्ड में न्यूनतम 5 वर्षों का लॉक इन पीरियड होता है। यदि आपको 5 वर्षों से पहले पैसों की जरूरत होती है तो आपको बता दें कि यह सेकेण्डरी मार्केट में लिस्टिड है। यानि कि आप जब चाहें किसी भी अन्य व्यक्ति को गोल्ड बॉण्ड सेकेण्डरी मार्केट के जरिए बेच सकते हैं। एनएसई और बीएसई बॉण्ड में ट्रेड करने की सुविधा देता है। आप अपना डीमेट गोल्ड बॉण्ड एनएसई के रजिस्टर्ड ब्रोकर्स के जरिए भी बेच सकते हैं। बॉण्ड की कीमतें बाजार पर निर्भर करती हैं। सेकेण्डरी मार्केट (एनएसई और बीएसई) के जरिए गोल्ड बॉण्ड खरीदा भी जा सकता है।
गोल्ड बॉण्ड के एवज में लोन: जरूरत पड़ने पर गोल्ड बॉण्ड के एवज में बैंक से लोन भी लिया जा सकता है। गोल्ड बॉण्ड पेपर को लोन के लिए कोलैटर्ल के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह पोस्ट ऑफिस की नैश्नल सेविंग सर्टिफिकेट के जैसा होता है।

बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट कराने के फायदे और नुकसान

बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट सबसे सुरक्षित निवेश विकल्प माना जाता है। इसमें निवेशक को तय अंतराल पर निश्चित रिटर्न मिलता है साथ ही बाजार के उतार-चढ़ाव का इस पर कोई असर नहीं पड़ता 


नई दिल्ली। बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट सबसे सुरक्षित निवेश विकल्प माना जाता है। इसमें निवेशक को तय अंतराल पर निश्चित रिटर्न मिलता है साथ ही बाजार के उतार-चढ़ाव का इस पर कोई असर नहीं पड़ता। अधिकांश फाइनेंशियल एडवाइजर अपनी कुल बचत का एक हिस्साै एफडी में निवेश करने की सलाह देते हैं। लेकिन एक्सपर्ट की माने तो इन सब बातों के बावजूद भी फिक्स्ड डिपॉजिट के कुछ नुकसान हैं।
जानिए फिक्स्ड डिपॉजिट करवाने के फायदे और नुकसान एफडी करवाने के फायदे

किसी बैंक या पोस्ट ऑफिस में एफडी कराने की सबसे पहला फायदा यह होता है कि यह निवेश पूरी तरह से जोखिम रहित होता है। साथ ही यह निवेश किसी भी तरह से लिंक नहीं होती। एफडी की समय अवधि समाप्त होने के बाद निवेशक को पूरी राशि ब्याज सहित वापस मिल जाती है। ब्याज दर वरिष्ठ नागरिकों के लिए कुछ अधिक होती है। साथ ही बैंक भी समय-समय पर समीक्षा कर बाजार के अनुरूप फिक्स्ड डिपॉजिट की दर को तय करते हैं। तमाम बैंकों की ओर से दी जाने वाली दर में मामूली सा अंतर होता है। आपको बता दें कि कई मामलों में बैंक अधिक निवेश आकर्षित करने के उद्देश्य से ग्राहकों को फिक्स्ड डिपॉजिट पर ऊंची दर का ऑफर देते हैं।

एफडी करवाने के नुकसान

बैंक एफडी पर मिलने वाला ब्याज महंगाई दर के बराबर ही होता है और कई बार इस दर से कम भी रह जाता है। वर्ष 2012-2014 के दौरान भारत की औसत महंगाई दर 9.76 फीसदी रही है। एक्सपर्ट इंवेस्टमेंट ऑप्शन पर रिटर्न को जोड़ते समय उपभोक्ता महंगाई की औसत दर 8 फीसदी के बराबर मानते हैं। ऐसे में बैंक एफडी पर यदि निवेशक को 8 से 8.5 फीसदी का ब्याज मिलता है तो निवेशक मुश्किल से ही महंगाई दर को पछाड़ पाने में सफल हो पाएगा। इस तरह निवेशक को इंवेस्टमेंट पर मिलने वाला रिटर्न शून्य हो जाता है।
आपको बता दें कि बैंक एफडी पर मिलने वाला रिटर्न कर योग्य होता है। आमतौर पर लंबी अवधि के लिए किया जाने वाला निवेश टैक्स फ्री होता है। लेकिन बैंक एफडी पर मिलने वाला ब्याज मौजूदा स्लैब में ही करयोग्य होता है। इस तरह मिलने वाला शुद्ध रिटर्न और घट जाता है। ऐसे में महंगाई की दर से कम रिटर्न और मिलने वाले रिटर्न का भी करयोग्य होने के कारण शुद्ध कमाई का घट जाना बैंक एफडी जैसे निवेश को बेहतर नहीं बनाते हैं।
एक्सपर्ट के मुताबिक कम उम्र में निवेश शुरू करने से लंबी अवधि के लिए इक्विटी म्युचुअल फंड में निवेश करना एक बेहतरीन विकल्प है। इसके अलावा यदि उम्र या किसी अन्य कारण निवेशक की जोखिम लेने की क्षमता नहीं है तो एफडी जैसे विकल्पों का चयन नहीं करना चाहिए।